महालक्ष्मी कवचम् | Mahalakshmi Kavacham | माँ लक्ष्मी की कृपा, धन और समृद्धि हेतु दिव्य स्तोत्र
Description
🌺 महालक्ष्मी कवचम् | Mahalakshmi Kavacham | माँ लक्ष्मी की कृपा, धन और समृद्धि हेतु दिव्य स्तोत्र 🌺
महालक्ष्मी कवचम् माँ महालक्ष्मी की दिव्य कृपा प्राप्त करने वाला अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली स्तोत्र है। श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका श्रवण एवं पाठ करने से धन, वैभव, सुख-समृद्धि, सौभाग्य तथा सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। यह कवच साधक के जीवन से नकारात्मकता, भय और आर्थिक बाधाओं को दूर कर माँ लक्ष्मी के आशीर्वाद का मार्ग प्रशस्त करता है।
इस दिव्य प्रस्तुति में विनया कार्तिक एवं सावित्री पृथ्वी की मधुर एवं भक्तिमय वाणी महालक्ष्मी कवचम् को और भी मनमोहक बनाती है। नियमित रूप से इस स्तोत्र का श्रवण मन को शांति, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है।
Track – Mahalakshmi Kavacham
Album - Divine Chants Of Lakshmi Ganesh
Singer - Vinaya Karthik,Savithri Prithvi
Composer - Gauri Yadwadkar
Music - Prithvi Chandrasekhar
Label - Times Music Spiritual
Video Supervision: - Chetan Garud Productions Studios LLP
Video Edit & VFX: - Chetan Garud Productions Studios LLP
🙏 महालक्ष्मी कवचम् के लाभ:
• धन एवं समृद्धि की प्राप्ति
• घर में सुख, शांति और सकारात्मकता का वास
• आर्थिक समस्याओं और बाधाओं में कमी
• आत्मबल एवं मानसिक शांति की वृद्धि
• माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा और आशीर्वाद
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🌺 जय माँ महालक्ष्मी 🌺
🙏 सब पर माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहे 🙏
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Lyrics :
अस्य श्रीमहालक्ष्मीकवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दः
महालक्ष्मीर्देवता महालक्ष्मीप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
इन्द्र उवाच । समस्तकवचानां तु तेजस्वि कवचोत्तमम् ।
आत्मरक्षणमारोग्यं सत्यं त्वं ब्रूहि गीष्पते ॥१॥
श्रीगुरुरुवाच । महालक्ष्म्यास्तु कवचं प्रवक्ष्यामि समासतः ।
चतुर्दशसु लोकेषु रहस्यं ब्रह्मणोदितम् ॥२॥
ब्रह्मोवाच । शिरो मे विष्णुपत्नी च ललाटममृतोद्भवा ।
चक्षुषी सुविशालाक्षी श्रवणे सागराम्बुजा ॥३॥
घ्राणं पातु वरारोहा जिह्वामाम्नायरूपिणी ।
मुखं पातु महालक्ष्मीः कण्ठं वैकुण्ठवासिनी ॥४॥
स्कन्धौ मे जानकी पातु भुजौ भार्गवनन्दिनी ।
बाहू द्वौ द्रविणी पातु करौ हरिवराङ्गना ॥५॥
वक्षः पातु च श्रीर्देवी हृदयं हरिसुन्दरी ।
कुक्षिं च वैष्णवी पातु नाभिं भुवनमातृका ॥६॥
कटिं च पातु वाराही सक्थिनी देवदेवता ।
ऊरू नारायणी पातु जानुनी चन्द्रसोदरी ॥७॥
इन्दिरा पातु जङ्घे मे पादौ भक्तनमस्कृता ।
नखान् तेजस्विनी पातु सर्वाङ्गं करूणामयी ॥८॥
ब्रह्मणा लोकरक्षार्थं निर्मितं कवचं श्रियः ।
ये पठन्ति महात्मानस्ते च धन्या जगत्त्रये ॥९॥
कवचेनावृताङ्गनां जनानां जयदा सदा ।
मातेव सर्वसुखदा भव त्वममरेश्वरी ॥१०॥
भूयः सिद्धिमवाप्नोति पूर्वोक्तं ब्रह्मणा स्वयम् ।
लक्ष्मीर्हरिप्रिया पद्मा एतन्नामत्रयं स्मरन् ॥११॥
नामत्रयमिदं जप्त्वा स याति परमां श्रियम् ।
यः पठेत्स च धर्मात्मा सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥१२॥
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