पापनाशिनी मंत्र सुनते ही मिलेगा सुकून | Papnashini Mantra | Powerful Healing Chant | Sadhana Sargam
Description
🙏 ॥ ॐ ॥ पापनाशिनी मंत्र ॥ 🙏
“Papnashini Mantra” एक अत्यंत पवित्र और दिव्य संस्कृत मंत्र है, जो शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शुद्धता प्रदान करने वाला माना जाता है। इस मंत्र का श्रवण मन को स्थिर करता है और नकारात्मक विचारों को दूर करने में सहायक होता है।
यह भजन/मंत्र “Well Being Mantras For New Born” एल्बम का हिस्सा है, जिसे विशेष रूप से शांति, संरक्षण और शुभ ऊर्जा के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। सुप्रसिद्ध गायिका साधना सरगम की मधुर और भावपूर्ण आवाज़ इस मंत्र को और भी अधिक दिव्य एवं प्रभावशाली बनाती है। शैलेश दाणी द्वारा किया गया संगीत संयोजन इस मंत्र की आध्यात्मिक अनुभूति को और गहरा करता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसे पवित्र मंत्रों का नियमित श्रवण और जप जीवन में शुद्धता, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह मंत्र विशेष रूप से ध्यान, पूजा, और दैनिक साधना के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
🌸 इस मंत्र को सुनने से मन शांत होता है, तनाव कम होता है और आत्मिक शक्ति में वृद्धि होती है। यह नवजात शिशु के लिए भी शुभ ऊर्जा और सुरक्षा प्रदान करने वाला माना गया है।
Track - Papnashini Mantra
Album - Well Being Mantras For New Born
Singer - - Sadhana Sargam
Composer - Shailesh Dani
Label - Times Music Spiritual
Video Supervision: - Abhi Visuals
Video Edit & VFX: - Abhi Visuals.
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॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥
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Lyrcis :
नवप्राणान्नवभिः सम्मिमीते
दीर्घायुत्वाय शतशारदाय
हरिते त्रीणि रजते
त्रीण्यस्य त्रीणि तपसा विष्ठितानि
अग्निः सूर्यश्चन्द्रमा
भूमिर आपो द्यौ रन्तरिक्ष
प्रदिशो दिशश्च
आर्तवा ऋतुभिः संविदाना
अन्नेन मा त्रिवृता पारयन्तु
प्रयः पोषास्त्रिवृति
श्रयन्तामनक्तु
पूषा पयसा घृतेन
अन्नस्य भूमा
पुरुषस्य भमा
भूमा पशूनां तैह
श्रयन्ताम्
इममादित्या
वसूनां सम् उक्षते ममग्ने
वर्धय वावृधानः
इममिन्द्र सम्
सृज वीर्येणास्मिन्
त्रिवृच्छ्रयता पोषयिष्णुः
भूमिष्ट्वा
पातु हरितेन
विश्वभृदग्निः
पिप्रत्वयसा सजोषाः
वीरुद्भिष्ठे
यर्जुनम्
संविदानम्
दक्षं दधातु
सुमनस्यमानम्
त्रेधा जातं
जन्मेदं
हिरण्यमग्निरेकम्
प्रियतमं बभूव
सोमस्यैकम्
हिंसितस्य
परापतत् अपामेकं
वेधसां रेत आहुस्तत्
ते हिरण्यं
त्रिवृदस्त्वायुषे
त्रायुषं
जमदग्नेः
कश्यपस्य त्रायुषम्
त्रेधामृतस्य
चक्षणम्
त्र्यायुषी ते करम्
त्रयः
सुपर्णास्त्रिवृता
यदायन्नेकाक्षरमभि
सम्भूय शक्रः
प्रत्योहन् मृत्युममृतेन
साकमन्तर्दधाना
दुरितानि विश्वा
दिवस्त्वा पातु
हरितं मध्यात्
त्वा पात्वर्जुनम्
भूम्या अयस्मयम्
पातु प्रागाद्
देवपुरा अयम्
इमास्तिस्रो
देवपुरास्तास्त्वा
रक्षन्तु सर्वतः
तास्त्वं बिभ्रद्
वर्चस्युत्तरो
द्विषतां भव
पुरम्
देवानाममृतम्
हिरण्यं य आभेधे प्रथमो
देवो अग्रे
तस्मै नमो
दश प्राचीः
कृणोम्यनु मान्यताम्
त्रिवृदा बधेमे
आ त्वा
श्रुतत्वर्यमा
पूषा बृहस्पतिः
अहर्जातस्य
यन्नाम तेन
त्वाति श्रुतामसि
ऋतुभिस्त्वावर्तवैरायुषे
वर्चसे त्वा
संवत्सरस्य तेजसा
तेन संहनु
कृण्मसि
घृतादुल्लुप्तं
मधुना समक्तम्
भूमिं दमहमच्युतं पारयिष्णु
भिन्दन्त्सपत्नान्
धराँश्च कृण्वदामारोह
महते सौभगाय
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